Hindutva

हिन्दुत्व का अर्थ है :-हिन्दू भावना तथा हिन्दू होने का भाव 

हिंदू और हिंदुत्व के बीच का क्या फर्क है ? 
हिंदू और हिंदुत्व के बीच के अंतर जो है वह Basically एक धर्म है जो भारत, नेपाल, भूटान आदि देशों में प्रमुखता से पाया जाता है. 

क्या हिंदुत्व धर्म थोड़ा अलग है ?
इसके चार बड़े संप्रदाय हैं 
1)शैव संप्रदाय ( शिव की पुजा की जाती है) 
2)शाक्त संप्रदाय ( देवी या मा की पुजा की जाती है) 
3)स्मार्त संप्रदाय ( सभी को बराबर माना जाता है) 
4)वैष्णव संप्रदाय ( विश्णु की पुजा की जाती है)

Hindutva - हिन्दुत्व 

इसमें तमाम तरह के विचार आते हैं जैसे की आत्मा का विचार, ब्रह्म का विचार, कर्म की मान्यता इसके अलावा यह सांसारिक वेदरणी है इससे पार होना यानी मोक्ष की कामना इस तरह के तमाम पुनर्जन्म की अवधारणा इस तरह के तमाम सारे विचार मिलकर के हिंदू दर्शन को एक मुकम्मल दर्शन बनाते हैं. अगर आप हिंदू धर्म के अंदर विमर्श में जाएंगे तो उसमें जो school of thoughts है वह दो टाइप के हैं 
1) एक आस्थिक 
2) दूसरे हैं नास्थिक 
आस्थिक मे 6 मिलेंगे जिसमें न्याय, सांख्य, योग, वैसेसिका, वेदांता, और मीमांसा, 
नास्तिक में आपको 3 मिलेंगे जैन, चरवाक, और बौद्ध 

हालांकि अभी जो इस समय इस देश में, जिसे आप हिंदू धर्म कहते हैं वह एक तरह का ब्राह्मण धर्म है क्योंकि हिंदू धर्म का अपने इतिहास के हिसाब से एक बड़ी लंबी यात्रा रही है तब यह सनातन धर्म होता था और सारे लोग एक बड़ी छतरी के नीचे अपने आप को हिंदू कहते थे लेकिन इस वक्त बौद्ध धर्म अपने आपको अलग मानता है उसकी उपासना पद्धति अलग लेकिन व्रहतर हिंदू दर्शन के बात की जाए तो उसकी छतरी में उसे लिया जाता है इस के नाम को लेकर भी दो तरह के मत है पहले लोग यह कहते हैं कि जो हिंदू है वह फारसी शब्द है और सिंधु नदी के इस पार रहने वाले लोगों को फर्सियो ने हिंदू कहा था कुछ लोगों का यह मानना है कि हिमालय का हा और सिंधु का इंदु मिलाकर हिंदू बना है लेकिन दोनों मत यह स्वीकार करते हैं कि हिंदू जो है वह पहले की उपासना पद्धति है जिसमें काफी डाइवर्सिटी है जिसमें आध्यात्मिक भी है, देव पूजा भी है, मूर्ति पूजा भी है. काफी “बटी हुयी” पर काफी बड़ी एक उपासना पद्धति है. लेकिन हिंदुओं के बारे में सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि हिंदुत्व केवल उपासना पद्धति नहीं है. 

तो फिर क्या है हिंदुत्व ? 

वास्तव मे हिंदुत्व एक राजनीतिक दर्शन है 1920 से 25 के बीच में सावरकर ने हिंदुत्व की थ्योरी गड़ी थी सावरकर उस वक्त नास्थिक थे उन्होंने कहा था कि एक राजनीतिक दर्शन है इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है उस थ्योरी के हिसाब से क्या है हिंदुत्व ? हिंदुत्व की थ्योरी के हिसाब से इस देश में दो तरह के लोग रहते हैं पहले वह जिन की पितृ भूमि भारत है और जिन की पुण्य भूमि भी भारत है. पितृ भूमि भारत मतलब भारत में पैदा हुए हैं और पुण्य भूमि भारत मतलब जिनका धर्म भी भारत में जन्मा है जैसे बौद्ध व जैन हुआ चरवाख हुआ सिक्ख हुआ ये सारे धर्म भारत से ही पैदा हुए हैं भारत की परिधि में ही पैदा हुए हैं तो हिंदुओं की थ्योरी मानती है कि इस तरह के लोग वह हुये जिनकी फितरत में भारत है और जिनकी पुण्य भूमि भी भारत है. दूसरी थ्योरी यह है कि उसमें दो तरह के लोग आते हैं जिनकी पितृ भूमि भारत है लेकिन पुण्य भूमि भारत नही है यानी पैदा तो भारत में हुए हैं लेकिन जिन का धर्म भारत मे भारत के बाहर से आया है. इस तरह से हिंदुत्व की जो हिंदुत्व राजनीतिक दर्शन है उसका आधार इस देश के लोगों को दो तरह के अलग-अलग नजरिए से बाट कर देखना है फिर उसकी परिणिथि क्या है फिर वह यह कहते हैं कि हिंदुत्व जो है वह भू सांस्कृतिक थ्योरी है यानि एक परिधि में एक निश्चित भौगोलिक परिधि है उसके भीतर रहने वाले सभी लोग इस तरह से दो तरह से हिंदू हैं फिर वह कहते हैं कि लेकिन सबसे अच्छी बात क्या होगी जब सारे लोग पितृ भूमि और पुण्य भूमि थ्योरी में सेट आ जाएंगे और यहीं से संघर्ष शुरु होता है प्रॉब्लम तब शुरू होती है जब हिंदुत्व की इस राजनीतिक विचारधारा को समाज में प्रयोजित करने का तरीका बताया जाता है सावरकर कहते हैं कि जिनकी पुण्यभूमि भारत नहीं है उनको हम समझा-बुझाकर और उनको हम प्यार से बता कर अपनी राष्ट्रीय धारा मे हिंदुत्व की वापस ले आएंगे उनकी नजर में राष्ट्रीयता और हिंदुत्व एक दूसरे के समनार्थी हैं तो उनकी थ्योरी यह है कि आप जो है उनको समझा बुझाकर प्यार से कि आपके पूर्वज सेम है आप का इतिहास सेम है इसलिए जो हमारे राष्ट्रीय गौरव हैं वही आपके भी राष्ट्रीय गौरव है ,से वापस आ जाएंगे यह सरकार का तरीका था 

लेकिन केशव राम बलिराम हेडगेवार जो संघ के सरसंघचालक हुए हैं वह अपनी किताब लिखते हैं बी आर अवर नेशन और डिफाइन उसमें वह पूरा तरीका ही बदल देते हैं वह दूसरे तरह के लोगों के लिए दो विकल्प रखते हैं पहला विकल्प मे रखते हैं या तो भारत छोड़ दें या फिर वह दोयम दर्जे की नागरिकता लेकर यहां पर रहे ये थे राम बलराम घटवार के हिंदुत्व के दर्शन को लागू करने के विचार इस दर्शन में वह इस तरीके की वह हिटलर का पक्ष लेते हुए तारीफ भी करते हैं कि किस तरह हिटलर ने जर्मनी में लागू किया और वहां यह सफल जा रहा है. 

क्या हिंदुत्व एक राष्ट्रीयता के समानार्थी थ्योरी हो सकती है ?

दरअसल ये सवाल ही गलत है क्योंकि भारत की राष्ट्रीयता तमाम तरह की साछा संस्कृतियों से आई है भारत में तमाम तरह की क्षेत्रीय असमांताये हैं इसलिए राष्ट्र का कोई भी छतरी इस सारी अस्मिता ओं को समेट सकता है, वह जो समय सकता है वह ऐसा नहीं हो सकता कि सभी धर्म की बात करें यहां पर सिर्फ हिंदू धर्म को बहुत ही संकीर्ण में हिंदू धर्म को मानने वालों को बहुत ही संकीर्ण नजरिए से संरक्षित किया गया है एक थ्योरी के अंदर क्योंकि भारत की राष्ट्रीयता बहुत Diverse है इसलिए हिंदुत्व की विचारधारा कभी भी राष्ट्रीयता की समनार्थी नहीं हो सकती .

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