पितृ पक्ष श्राद्ध पर्व की कथा

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श्राद्ध पर्व को लेकर हिंदु धर्म मे एक बहु प्रचलित कथा है इस कथा को सुनने मात्र से जन्म - जन्मांतर के पित्र दोष समाप्त हो जाते हैं और मृत पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है. कथा के अनुसार कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुंची तो उन्हें भोजन के रूप में बहुत सारा स्वर्ण इंद्र के द्वारा प्रदान किया गया. कर्ण की आत्मा को कुछ समझ में नहीं आया कि उन्हे भोजन मे सोना क्यो दिया गया .उन्होंने देवताओं के राजा इंद्र से प्रश्न किया कि भोजन के स्थान पर सोना क्यों दिया गया है तो देवराज इंद्र ने उसे कहा कि तुमने जीवित रहते हुए अपने पितरों के निमित्त कुछ भी नहीं किया है. तुम ने केवल सोने का दान किया है. पितरों के निमित्त यदि तुम कुछ करते तो उस वस्तु को पुनः स्वर्ग में प्राप्त करते क्योंकि तुमने जीवन भर सोने का दान किया है इसलिए भोजन में भी तुम को सोना ही यहां पर प्राप्त होगा पूर्वजों के निमित्त यदि तुमने भोजन का दान किया होता या भोजन किसी को करवाया होता - तब तो तुम्हें यहां पर भोजन भी प्राप्त होता.

तब कर्ण ने कहा कि मुझे अपने पूर्वजों के बारे में पता नहीं था इसी वजह से मैं उनके निमित्त कुछ भी भोजन का दान नहीं कर पाया देवराज इंद्र ने कहा कि कर्ण जाओ तुम्हें अपनी गलती सुधारने का एक अवसर हम प्रदान करते हैं पुनः पृथ्वी पर जाओ और 16 दिन तक पृथ्वी पर निवास करना . भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर के आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक 16 दिन के लिए कर्ण को पृथ्वी पर भेज दिया और कर्ण ने अपने पूर्वजों को समर्पित करते हुए उनकी याद में भोजन का दान किया, तर्पण किया और पिंडदान किया. इस 16 दिन की अवधि को ही पितृपक्ष कहा जाने लगा तो पित्र पक्ष (shradh paksha) की एक यह कथा है.

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